पी गया

साकी की हर निगाह पे बल खा के पी गया
लहरों से खेलता हुआ लहरा के पी गया।

बेखौफियोंके कैफसे घबरा के पी गया
तौबा को तोड़-ताड के थर्रा के पी गया।

ज़ाहिद ये मेरी शोखी-ए-रिंदाना देखना
रेहमत को बातों-बातों में बहला के पी गया।

सरमस्ती-ए-अज़ल मुझे जब याद आ गई
दुनिया-ए-एतबार को ठुकरा के पी गया।

आज़ुर्दगी-ए-खा‍तिर-ए-साक़ी को देख कर
मुझको वो शर्म आई के शरमा के पी गया।

ऐ रेहमते तमाम मेरी हर ख़ता मुआफ़
मैं इंतेहा-ए-शौक़ में घबरा के पी गया।

पीता बग़ैर इज़्न ये कब थी मेरी मजाल
दरपरदा चश्म-ए-यार की शेह पा के पी गया।

इस जाने मयकदा की क़सम बारहा जिगर
कुल आलम-ए-बिसात पर मैं छा के पी गया।

– जिगर मुरादाबादी

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3 thoughts on “पी गया

  1. ऐ रेहमते तमाम मेरी हर ख़ता मुआफ़
    मैं इंतेहा-ए-शौक़ में घबरा के पी गया।

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