चल चले चल

जरा हाथों में ले कर हाथ मेरा, चल चले चल
बहोत दूर तक अभी तो है अंधेरा, चल चले चल ।

अगर आँखों ने समज़ी है हमारी आँख की बात,
भले हो कोई भी नज़रों का पहेरा, चल चले चल ।

उफक पर रोशनी दिखती है तो अब हौंसला रख,
अगर तुम साथ हो होगा सवेरा, चल चले चल ।

जहां सहरा सा हो विराँ न कोई बस्ती हो पर,
बड़ा खुशहाल हो अपना बसेरा, चल चले चल ।

ये सब मुमकिन भी है आसान है सब राहें मेरी ,
जो हरदम हर घड़ी हो साथ तेरा, चल चले चल ।

– अशोक जानी ‘आनंद’

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7 thoughts on “चल चले चल

  1. अगर आँखों ने समज़ी है हमारी आँख की बात,
    भले हो कोई भी नज़रों का पहेरा, चल चले चल ।
    चलो … चलते है .. 🙂

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