निकल पड़ता हैं

रोज़ तारों को नुमाइश में खलल पड़ता हैं
चाँद पागल हैं अंधेरे में निकल पड़ता हैं

मैं समंदर हूँ कुल्हाड़ी से नहीं कट सकता
कोई फव्वारा नही हूँ जो उबल पड़ता हैं

कल वहाँ चाँद उगा करते थे हर आहट पर
अपने रास्ते में जो वीरान महल पड़ता हैं

ना त-आरूफ़ ना त-अल्लुक हैं मगर दिल अक्सर
नाम सुनता हैं तुम्हारा तो उछल पड़ता हैं

उसकी याद आई हैं साँसों ज़रा धीरे चलो
धड़कनो से भी इबादत में खलल पड़ता हैं

– ‎राहत इन्दौरी‬

Advertisements

6 thoughts on “निकल पड़ता हैं

  1. वाह,बढिया मतला और पूरी गजल काबिल-ए-दाद……!!

    इस गजल को जनाब राहत इंदौरी सा’ब की जुबान से सुनने का मझा भी अलग है । 🙂

  2. उसकी याद अाई हैं साँसों जरा धीरे चलो
    धडकनों से भी इबादत में खलल पडता है

    बहोत सुन्दर रचना।

Leave a Reply

Fill in your details below or click an icon to log in:

WordPress.com Logo

You are commenting using your WordPress.com account. Log Out / Change )

Twitter picture

You are commenting using your Twitter account. Log Out / Change )

Facebook photo

You are commenting using your Facebook account. Log Out / Change )

Google+ photo

You are commenting using your Google+ account. Log Out / Change )

Connecting to %s