शायद

उस पार तुम खड़ी हो – ख़ामोश.
इस पार खड़ा हूँ मैं – गुमसुम.
बीच में बिखरे हैं –
वक़्त की शाख़ से टूटे
लम्हें – दिन – महीने – साल..
दसियों साल,
सैंकड़ों महीने,
हज़ारों दिन,
अनगिनत लम्हें !
तुम बाँहें पसार कर पुकारती हो मुझे –
कि, चले आओ..
पतझर के इन सूखे पत्तों को रौंद कर.
शर्त इतनी है कि,
लम्हों के कुचलने की आवाज़ ना होने पाये !
मैं ठिठक कर मायूस खड़ा हूँ,
जाऊं कैसे भला तुम तक !?!
तभी लुढ़कता है एक आँसू
फिर दूसरा,
फिर तीसरा..
फिर अनगिनत आँसू गीले-गीले
तमाम लम्हें मेरे भीग चुके हैं.
सीले-सीले इन पत्तों में
अब कोई चरमराहट नहीं होती.
शायद,
अब मैं तुम तक पहुँच सकता हूँ !

– कुमार जिनेश शाह

6 thoughts on “शायद

  1. शायद,
    अब मैं तुम तक पहुँच सकता हूँ !…. वाह क्या बात…

    ह्रदय के नाजुक स्पंदनों को अच्छी तरह सँजोया है… !!!

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