ग़ज़ल आई

पाँव चल कर, मचल मचल आई,
नींद न आई तो फिर ग़ज़ल आई।

हम मना करते है मगर देखो,
याद आई, वॉ जी को खल आई।

नींद जिसने उड़ा दी रातों की,
पीड़ वो आँख में उबल आई।

इतनी बे-शर्म हो गई है कि,
शर्म आंखो से बस निकल आई।

कल जो आंखो में हमने बोये थे,
आज सपनों कि वो फसल आई।

– अशोक जानी ‘आनन्द’

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