याद आई

मुझे कल तुम्हारी बहोत याद आई,
दिसंबर की ठंडीमे जैसे रजाई।

सुना है वो आया था मेरे शहर में,
न मिलने भी आया न सूरत दिखाई।

बहोत शोरोगुल था सरे राह लेकिन,
थी उम्मीद जिसकी वो आहट न आई।

अंधेरों में जल के मिटे इश्क़ वाले,
शमाँ ने तो रस्मो रवायत निभाई।

दफ़न कर दो चाहत ,अकेले नहीं तुम,
यहाँ कितने रांझों ने हीरें गवाँई.

– स्मिता शाह ‘ मीरां ‘

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