आराम करती हैं

थकी-मांदी हुई बेचारियाँ आराम करती हैं,
न छेड़ो ज़ख़्म को बीमारियाँ आराम करती हैं।

सुलाकर अपने बच्चे को यही हर माँ समझती है,
कि उसकी गोद में किलकारियाँ आराम करती हैं।

किसी दिन ऎ समुन्दर झांक मेरे दिल के सहरा में,
न जाने कितनी ही तहदारियाँ आराम करती हैं।

अभी तक दिल में रोशन हैं तुम्हारी याद के जुगनू,
अभी इस राख में चिन्गारियाँ आराम करती हैं।

कहां रंगों की आमेज़िश* की ज़हमत* आप करते हैं,
लहू से खेलिये पिचकारियाँ आराम करती हैं।

– मुनव्वर राणा

*आमेज़िश = प्रकटन, *ज़हमत = कष्ट

7 thoughts on “आराम करती हैं

  1. सुलाकर अपने बच्चे को यही हर माँ समझती है,
    कि उसकी गोद में किलकारियाँ आराम करती हैं।
    સુંદર રચના

  2. किसी दिन ऎ समुन्दर झांक मेरे दिल के सहरा में,
    न जाने कितनी ही तहदारियाँ आराम करती हैं।
    સરસ ગઝલ.

  3. सुलाकर अपने बच्चे को यही हर माँ समझती है,
    कि उसकी गोद में किलकारियाँ आराम करती हैं।… बढ़िया ॥

    बड़ी खूबसूरत गज़ल…!!

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