चलते चलते

चलते चलते बात बात में बात सभी ने कर डाली,
हमने अपनी बात सुनाइ कोई नहीं था , मैं खाली।

ठोकर खा कर गिर जाने का वैसे तो अफ़सोस नहीं,
लेकिन मेरे गिरने पर कुछ लोग बजाते थे ताली।

हाथ में लेकर हाथ अभी तक हम चलते चलते ही गये,
फ़िर भी ना जाने युं मन में गैरसमझ हे क्यों पाली?

एक हमारा हुआ घरौंदा शाख सज़र की सुखी है,
बाकी सारे बाग में क्यों कर हरी भरी है सब डाली।

ईतने सारे गम है फ़िर भी हमने शिश झुकाया ना,
हम तो हाथ उठाते है बस ‘आनंद ‘ से भरी प्याली ।

– अशोक जानी ‘आनंद’

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9 thoughts on “चलते चलते

  1. ‘आनंद ‘ से भरी प्याली …. wah… hame bhi pilayiye anandbabu…
    very nice… it’s a geet-gazal… enjoyed fully….

  2. વાહ! ‘આનંદ’ જ આનંદ !
    ईतने सारे गम है फ़िर भी हमने शिश झुकाया ना,
    हम तो हाथ उठाते है बस ‘आनंद ‘ से भरी प्याली ।

  3. સુંદર…ગીત-ગઝ્લના ફોર્મમાંં જલસો …

  4. बहुत ही खूब

    ‘आनंद ‘ से भरी प्याली…. क्या बात !!!

  5. इतने सारे ग़म है फिरकी हमने शिशु झुकाया ना,
    हम तो हाथ उठाते है बस ‘ आनंद ‘ से भरी प्याली ।

    वाह, बहुत ख़ूब ।

  6. કયા બાત હૈ !
    ठोकर खा कर गिर जाने का वैसे तो अफ़सोस नहीं,
    लेकिन मेरे गिरने पर कुछ लोग बजाते थे ताली।

  7. ठोकर खा कर गिर जाने का वैसे तो अफ़सोस नहीं,
    लेकिन मेरे गिरने पर कुछ लोग बजाते थे ताली।

    Wah sir shu gazal chhe..aahaa

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