निकल पड़ता हैं

रोज़ तारों को नुमाइश में खलल पड़ता हैं,
चाँद पागल हैं अंधेरे में निकल पड़ता हैं ।

मैं समंदर हूँ कुल्हाड़ी से नहीं कट सकता,
कोई फव्वारा नही हूँ जो उबल पड़ता हैं ।

कल वहाँ चाँद उगा करते थे हर आहट पर,
अपने रास्ते में जो वीरान महल पड़ता हैं ।

ना त-आरूफ़ ना त-अल्लुक हैं मगर दिल अक्सर,
नाम सुनता हैं तुम्हारा तो उछल पड़ता हैं ।

उसकी याद आई हैं साँसों ज़रा धीरे चलो,
धड़कनो से भी इबादत में खलल पड़ता हैं ।

– राहत इन्दौरी

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8 thoughts on “निकल पड़ता हैं

  1. मैं समंदर हूँ कुल्हाड़ी से नहीं कट सकता,
    कोई फव्वारा नही हूँ जो उबल पड़ता हैं ।… बहोत ही बढ़िया

    हर एक अशआर काबिल-ए-तारीफ

  2. मैं समंदर हूँ कुल्हाड़ी से नहीं कट सकता,
    कोई फ़व्वारा नहीं हूँ जो उबल पड़ता हैं ।

    सम्रगतया सुंदर ग़ज़ल ।

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