सुनाता हूँ

मैं जिसे ओढ़ता-बिछाता हूँ,
वो ग़ज़ल आपको सुनाता हूँ ।

एक जंगल है तेरी आँखों में,
मैं जहाँ राह भूल जाता हूँ ।

तू किसी रेल-सी गुज़रती है,
मैं किसी पुल-सा थरथराता हूँ ।

हर तरफ़ ऐतराज़ होता है,
मैं अगर रौशनी में आता हूँ ।

एक बाज़ू उखड़ गया जबसे,
और ज़्यादा वज़न उठाता हूँ ।

मैं तुझे भूलने की कोशिश में,
आज कितने क़रीब पाता हूँ ।

कौन ये फ़ासला निभाएगा,
मैं फ़रिश्ता हूँ सच बताता हूँ।

– दुष्यंत कुमार

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5 thoughts on “सुनाता हूँ

  1. Great gazal
    एक बाज़ू उखड़ गया जबसे,
    और ज़्यादा वज़न उठाता हूँ ।

  2. तू किसी रेल-सी गुज़रती है,
    मैं किसी पुल-सा थरथराता हूँ ।
    my fvt one…

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